बिना बीमा के गोदामों में पड़ा 10 हजार करोड़ का अनाज, सिस्टम की बड़ी लापरवाही

बीमा सुरक्षा के बिना जोखिम भरा भंडारण

मध्यप्रदेश में सरकारी वेयरहाउसिंग व्यवस्था एक बड़े संकट से जूझ रही है। 10 हजार करोड़ रुपए से अधिक का अनाज और दवाएं पिछले चार महीनों से बिना किसी बीमा कवरेज के रखी गई हैं। जबकि नियमों के अनुसार एक भी दिन बीमा के बिना भंडारण की इजाजत नहीं होती।

यह लापरवाही तब उजागर हुई जब बीमा की प्रक्रिया में देरी और ब्रोकर सिस्टम की जटिलताएं सामने आईं। पहले जहां बीमा कंपनियों को सीधे टेंडर दिया जाता था, अब एक निजी ब्रोकर को बीच में शामिल कर निर्णय लिया गया है।

ब्रोकर व्यवस्था की जटिलता

बिना अनुभव के कंपनी को मिली जिम्मेदारी

सूत्रों के अनुसार, दिसंबर 2024 में एक प्राइवेट इंश्योरेंस ब्रोकिंग कंपनी ‘एक्सपेरिटस इंश्योरेंस ब्रोकर्स प्रा. लि.’ ने प्रेजेंटेशन दिया और वही कंपनी बाद में नियुक्त कर दी गई। अधिकारियों ने इस फैसले का विरोध किया था, लेकिन उच्च स्तर से निर्णय थोप दिया गया।

नई बीमा दरें और पुरानी क्लेम समस्याएं

बीमा के नए टेंडर में कई कंपनियाँ सामने आईं, जिनमें से कुछ के पहले से क्लेम पेंडिंग हैं। जबकि यह दावा किया जा रहा है कि ब्रोकर क्लेम जल्दी निपटवाएगा, हकीकत में पहले भी बिना ब्रोकर के क्लेम जल्द सेटल हुए हैं।

प्रक्रिया में देरी और टेंडर रद्द

सितंबर 2024 में बीमा का टेंडर किया गया था, लेकिन इसे रद्द कर दिया गया और पुरानी बीमा कंपनी को जनवरी 2025 तक एक्सटेंशन दे दिया गया। नतीजतन, फरवरी 2025 से अब तक अनाज बिना बीमा के पड़ा है, जिससे बड़े वित्तीय खतरे पैदा हो गए हैं।

बढ़ती बीमा दरें और नमी का नया मुद्दा

पहले बीमा केवल आग, चोरी और जलभराव जैसी घटनाओं को कवर करता था, लेकिन अब अनाज की नमी को भी बीमा शर्तों में शामिल किया जा रहा है। इसी कारण बीमा दरें 2-3 गुना तक बढ़ गई हैं। पहले जहां प्रीमियम 1.61 करोड़ रुपए था, वहीं अब यह 5 से 7 करोड़ तक पहुँच सकता है।

ब्रोकर के कारण बढ़ता खर्च

ब्रोकर को मिलने वाला कमीशन 10-20 प्रतिशत तक होता है, जो प्रीमियम में ही जुड़ जाता है। यह अतिरिक्त बोझ अंततः राज्य सरकार पर ही पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रोकर को शामिल करने से बीमा कंपनियों से सीधे मोलभाव की गुंजाइश खत्म हो जाती है।

विशेषज्ञों की राय

“नमी जैसे प्राकृतिक कारकों को बीमा में शामिल करना अनावश्यक खर्च बढ़ाने की रणनीति लगती है। इससे बीमा की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े होते हैं।”
– संभव सेठी, बीमा विशेषज्ञ

सरकारी पक्ष का तर्क

“बीमा में देरी दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन दरें अचानक बढ़ने के कारण टेंडर रद्द किया गया। अब नमी को भी बीमा में शामिल कर लिया गया है।”
– अनुराग वर्मा, एमडी, मप्र वेयरहाउसिंग कॉर्पोरेशन

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