मध्यप्रदेश में पिछले 6 महीनों में 10 से ज्यादा पुलिसकर्मियों ने आत्महत्या की। तनाव, पारिवारिक दबाव, ब्लैकमेलिंग और जुए की लत प्रमुख कारण बने। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।
भोपाल | 1 जून 2025
मध्यप्रदेश में पुलिस बल को लेकर एक चिंताजनक आंकड़ा सामने आया है, जिसमें बीते 6 महीनों में 10 से अधिक पुलिसकर्मियों ने आत्महत्या जैसा गंभीर कदम उठाया है। इन मामलों में पुलिसकर्मियों की आत्महत्या के कारण व्यक्तिगत तनाव, मानसिक बीमारियां, विभागीय दबाव और निजी संबंधों से जुड़ी जटिलताएं रही हैं।
ताजा मामला इंदौर के एमआईजी क्षेत्र का है, जहां एक महिला कांस्टेबल विनोद यादव के सरकारी क्वार्टर में पहुंची और उन्हें फंदे पर लटका पाया। जांच में सामने आया कि यही महिला उन्हें निजी कारणों से ब्लैकमेल कर रही थी।
ऐसे ही अन्य मामलों में छतरपुर के कोतवाली थाने के प्रभारी अरविंद कुजूर ने ब्लैकमेलिंग के चलते खुद को गोली मार ली थी। वहीं, जबलपुर में पदस्थ आरक्षक ब्रजेश बड़पुर जुए की लत के कारण कर्ज में डूबे हुए थे और अंततः आत्महत्या कर बैठे।
इंदौर की महिला कांस्टेबल मानसी मुराड़िया पेट की बीमारी से परेशान थीं। मानसिक तनाव ने उन्हें इस हद तक तोड़ दिया कि उन्होंने फांसी लगाकर अपनी जान दे दी।
एक अन्य मामला इंदौर के हेड कॉन्स्टेबल नवीन शर्मा का है, जो लंबे समय से बीमार थे और ड्यूटी पर नहीं आ पा रहे थे। बीमारी ने उन्हें मानसिक रूप से इतना कमजोर बना दिया कि आत्महत्या कर ली।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. जय प्रकाश अग्रवाल का कहना है कि पुलिसकर्मियों में आत्महत्या के पीछे सबसे बड़ा कारण है – मानसिक तनाव का अनदेखा किया जाना। उनके अनुसार, डिपार्टमेंट की कठोर ड्यूटी और पारिवारिक दबाव, दोनों ही मिलकर मानसिक असंतुलन को जन्म देते हैं। कई बार यह स्थिति पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) तक पहुंच जाती है।
रिटायर्ड स्पेशल डीजी शैलेन्द्र श्रीवास्तव कहते हैं कि पुलिस की नौकरी एक इमरजेंसी सेवा है, जहां स्टाफ की कमी के चलते काम का बोझ अत्यधिक होता है। इसमें कोई नियमित समयसारिणी नहीं होती, जिससे मानसिक संतुलन प्रभावित होता है।
स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट 2019 के अनुसार, लगभग 24% पुलिसकर्मी औसतन 16 घंटे से ज्यादा काम करते हैं, और 73% ने माना कि ज्यादा वर्कलोड उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।
इन आत्महत्या के मामलों को रोकने के लिए पुलिस विभाग को मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीरता से ध्यान देना होगा, साथ ही कर्मचारियों को काउंसलिंग और समय-समय पर मानसिक राहत प्रदान करने की व्यवस्था करनी चाहिए।




