2025 के भारत-पाक तनाव के बाद उपजे कूटनीतिक माहौल में अब पाकिस्तान बैकफुट पर है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के जरिए भारत ने पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया, जिससे पाकिस्तान की सेना और राजनयिक स्थिति दोनों को करारा झटका लगा।
भारत ने जिस प्रकार दुनियाभर में अपने संसदीय प्रतिनिधिमंडल भेजकर पाकिस्तान को आतंक के मुद्दे पर घेरा, उससे पाकिस्तान की साख अंतरराष्ट्रीय मंच पर कमजोर हुई है। जवाब में अब पाकिस्तान ने भी एक कूटनीतिक मोर्चा खोला है।
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अपने सबसे भरोसेमंद चेहरे, बिलावल भुट्टो, को इस अभियान की कमान सौंपी है। बिलावल के नेतृत्व में पाकिस्तान के प्रतिनिधिमंडल दुनियाभर की राजधानियों में घूमकर यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि पाकिस्तान शांति चाहता है और वह आतंकवाद के खिलाफ है।
बिलावल का यह अभियान पाकिस्तान के लिए ‘करो या मरो’ जैसा है। भारत की मजबूत तैयारी, सटीक दलीलें और पहले से की गई प्लानिंग के सामने पाकिस्तान का तर्क क्या दुनिया में असर डालेगा, यह आने वाला समय बताएगा।
कई जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान की रणनीति देर से शुरू हुई और इसके पास दिखाने के लिए पर्याप्त ठोस सुबूत नहीं हैं। वहीं, भारत ने आतंकवाद से जुड़ी अपनी चिंताओं को फील्ड रिपोर्ट, इंटेलिजेंस और वैश्विक समझौतों के संदर्भ में पेश किया है।
पाकिस्तान के लिए यह प्रयास न सिर्फ उसकी कूटनीतिक परीक्षा है बल्कि उसकी आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता भी इसी पर टिकी है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर समर्थन न मिलने की स्थिति में IMF जैसी संस्थाओं से मदद मिलना भी मुश्किल हो सकता है।
दुनिया अब सिर्फ बयानों से नहीं चलती। उसे ठोस एक्शन और भरोसेमंद रिकॉर्ड चाहिए। पाकिस्तान के पास अब सिर्फ यही एक मौका है कि वह अपनी छवि में सुधार लाकर खुद को जिम्मेदार राष्ट्र सिद्ध करे। लेकिन क्या बिलावल यह कर पाएंगे?





