कवि और विचारक को अंतिम विदाई: साहित्यकार प्रो. अजहर हाशमी का निधन, राजस्थान में हुआ अंतिम संस्कार। जानिए उनकी प्रमुख रचनाएं और साहित्यिक योगदान।
एक युग का अंत: प्रो. हाशमी की अंतिम विदाई

प्रोफेसर अजहर हाशमी, जो रतलाम और मालवा की पहचान थे, अब हमारे बीच नहीं रहे। मंगलवार शाम रतलाम के एक निजी अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। वे पिछले एक महीने से अस्वस्थ चल रहे थे और हॉस्पिटल में भर्ती थे। बुधवार सुबह उन्हें राजस्थान के पिड़वा गांव में सुपुर्द-ए-खाक किया गया।
उनके निधन से साहित्यिक जगत में शोक की लहर फैल गई है। वरिष्ठ साहित्यकारों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उन्हें अंतिम विदाई दी।
रतलाम की पहचान थे हाशमी
रतलाम के प्रेस क्लब अध्यक्ष मुकेश गोस्वामी ने कहा, “हाशमी जी से रतलाम की साहित्यिक पहचान जुड़ी हुई थी। उन्होंने न सिर्फ कविताएं लिखीं बल्कि समाज में जागरूकता भी फैलाई।”
उनकी रचनाएं सच्चाई और संवेदना का स्वर थीं। वे व्यंग्य, कविता, गीत और सामाजिक चिंतन में समान रूप से पारंगत थे।
‘मुझे राम वाला हिंदुस्तान चाहिए’
प्रो. हाशमी की यह कविता आज भी लोगों की जुबान पर है। इसमें उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द की बात कही थी। उनकी कविता ‘बेटी बचाओ’ भी व्यापक स्तर पर प्रचलित हुई। हाशमी जी की रचनाएं आज भी नई पीढ़ी को प्रेरणा देती हैं।
मंत्री चेतन्य काश्यप की श्रद्धांजलि
कैबिनेट मंत्री चेतन्य काश्यप ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा, “हाशमी जी जैसे बहुआयामी साहित्यकार का जाना केवल रतलाम नहीं, पूरे मध्यप्रदेश की अपूरणीय क्षति है। वे एक अध्येता, रचनाकार और सामाजिक विचारक थे।”
साहित्यिक मंचों के सम्राट
प्रो. हाशमी को कविता पाठ और मंच संचालन की गहरी समझ थी। उन्होंने देशभर में मंचों पर अपनी प्रस्तुतियों से साहित्य प्रेमियों का दिल जीता। वे नई पीढ़ी के लिए आदर्श थे।
समाज के हर तबके में लोकप्रिय
उनकी लोकप्रियता किसी धर्म, जाति या वर्ग की मोहताज नहीं थी। वे सभी के लिए समान रूप से प्रिय थे। उनके निधन के बाद जो सामाजिक और साहित्यिक शून्य उत्पन्न हुआ है, उसकी भरपाई शायद कभी नहीं हो सकेगी।




