मस्जिद को लेकर जबलपुर में राजनीतिक और धार्मिक माहौल तनावपूर्ण होता जा रहा है। कलेक्टर की विवादित पोस्ट के बाद हिंदू संगठनों ने विरोध तेज कर दिया है। सोमवार को रांझी क्षेत्र में प्रदर्शनकारियों ने कलेक्टर का अर्थी जुलूस निकाला और प्रशासनिक कार्रवाई की मांग की।
- कलेक्टर की पोस्ट और उसका प्रभाव
- हिंदू संगठनों का आक्रोश
- प्रशासनिक जवाबदेही
- मस्जिद कमेटी का पक्ष और दस्तावेज
- विवाद का ऐतिहासिक पक्ष
कलेक्टर की पोस्ट और उसका प्रभाव
कलेक्टर कार्यालय के आधिकारिक फेसबुक पेज पर 12 जुलाई को एक पोस्ट शेयर की गई जिसमें लिखा था कि मस्जिद का निर्माण वैध रूप से हुआ है और मंदिर की भूमि पर कोई निर्माण नहीं हुआ। यह पोस्ट कुछ ही घंटों में वायरल हो गई, और बाद में हटा दी गई।
हिंदू संगठनों का आक्रोश
विहिप और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने इस पोस्ट को सरकारी पक्षपात बताया और कड़ा विरोध जताया। विरोध में शहर भर में प्रदर्शन हुए और आज (मंगलवार) को जिले के 42 स्थानों पर प्रदर्शन की योजना बनाई गई है।
प्रशासनिक जवाबदेही
नए एसडीएम ऋषभ जैन ने बताया कि पोस्ट कलेक्टर की जानकारी के बिना डाली गई थी। विवाद के कारण पुराने एसडीएम को हटाया गया है। साथ ही स्वीकार किया गया कि बंदोबस्त प्रक्रिया में त्रुटियां हुई हैं जिन पर अब न्यायालय में सुनवाई लंबित है।

मस्जिद कमेटी का पक्ष और दस्तावेज
मस्जिद कमेटी के अनुसार वे उस ज़मीन के मालिक हैं और उन्होंने सभी दस्तावेज कोर्ट में पेश किए हैं। एडवोकेट इरशाद अली ने बताया कि मस्जिद 1980 से पहले की बनी है और उनके नाम दो खसरे भी दर्ज थे। प्रशासन की गलती से एक खसरे से नाम हट गया जिसे ठीक कराने का प्रयास किया जा रहा है।
विवाद का ऐतिहासिक पक्ष
विहिप का दावा है कि मस्जिद का निर्माण खसरा नंबर 169 की जमीन पर हुआ जो गायत्री बाल मंदिर ट्रस्ट से जुड़ी है। हालांकि, ट्रस्ट ने खुद अब तक कोई शिकायत नहीं की है। विवाद तब शुरू हुआ जब प्रथम तल पर निर्माण शुरू किया गया और विहिप ने इसे मुद्दा बनाया। मामला कोर्ट में है और हल निकलने की उम्मीद लंबी खिंच सकती है।



विवाद में धार्मिक संवेदनाओं से ज्यादा प्रशासनिक असावधानी सामने आई है। गलत सर्वे नंबर, नक्शे में त्रुटियां और पारदर्शिता की कमी ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया। मामले में स्पष्ट जांच और निष्पक्ष समाधान से ही शहर में शांति और विश्वास कायम रह सकता है।




