
- विवाद की शुरुआत
- कार्यकर्ताओं का गुस्सा
- पुलिस की कार्रवाई
- पिछली घटना
- मूल मामला
- प्रशासन के निर्देश
- आगे का रास्ता
इंदौर गणेश मूर्ति विवाद एक बार फिर सामाजिक और धार्मिक चर्चा का विषय बन गया है। खजराना इलाके में रविवार को तब विवाद खड़ा हो गया जब कुछ कलाकारों ने भगवान गणेश के हाथों में एक ‘मॉडर्न युवती’ की आकृति बनाना शुरू किया। जैसे ही यह जानकारी हिंदू संगठनों को मिली, उन्होंने इस पर तीखी आपत्ति जताई।
विवाद की शुरुआत
बंगाल से आए कारीगर एक नई शैली की गणेश प्रतिमा बना रहे थे जिसमें भगवान श्री गणेश के हाथों में एक आधुनिक परिधान पहनी युवती को दिखाया जा रहा था। स्थानीय निवासियों और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को जैसे ही इसकी भनक लगी, वे तुरंत मौके पर पहुंच गए और विरोध जताया।
कार्यकर्ताओं का गुस्सा
बजरंग दल के विभाग संयोजक प्रवीण दरेकर के नेतृत्व में आए कार्यकर्ताओं ने मूर्तिकारों के मुंह पर कालिख पोत दी और उन्हें खजराना थाने लेकर पहुंचे। उनका आरोप था कि यह मूर्ति धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली है और यह भारत की सांस्कृतिक परंपरा के खिलाफ है।
पुलिस की कार्रवाई
थाने में एएसआई सुरेंद्र सिंह और टीआई मनोज सेंधव ने मामले को गंभीरता से लिया और कारीगरों के खिलाफ धार्मिक भावनाएं भड़काने की शिकायत दर्ज की गई। इसके साथ ही, सभी कारीगरों की पहचान, पते और दस्तावेजों की जांच शुरू की गई।
पिछली घटना का संदर्भ
यह पहली बार नहीं है जब इंदौर गणेश मूर्ति विवाद सामने आया है। पिछले वर्ष खजराना क्षेत्र में नवरात्र के दौरान देवी प्रतिमा को ‘बुर्के’ जैसी पोशाक पहनाने पर भी बवाल मचा था। उस समय भी पुलिस जांच में शिकायत गलत पाई गई थी, लेकिन विवाद काफी फैल चुका था।
मूल मामला क्या है?
मुख्य रूप से विवाद का कारण भगवान गणेश के हाथों में आधुनिक युवती का होना था, जिसे परंपरा के विरुद्ध माना गया। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इससे समाज में गलत संदेश जाता है और यह धार्मिक अपमान की श्रेणी में आता है।
प्रशासन के निर्देश
थाना प्रभारी मनोज सेंधव ने सभी मूर्तिकारों के साथ बैठक कर निर्देश दिए हैं कि आगे से कोई भी मूर्ति इस प्रकार की ना बनाई जाए जिससे धार्मिक भावनाएं आहत हों। उन्होंने सभी कारीगरों की डिटेल एक रजिस्टर में दर्ज कराने के निर्देश भी दिए हैं।
आगे का रास्ता
इस तरह के इंदौर गणेश मूर्ति विवाद समाज के भीतर धार्मिक सहिष्णुता और रचनात्मकता के बीच एक स्पष्ट सीमा रेखा को दर्शाते हैं। कलाकारों को अपनी अभिव्यक्ति की आजादी है लेकिन वह आस्था की सीमाओं के भीतर होनी चाहिए। प्रशासन और धार्मिक संगठनों को समन्वय बनाकर भविष्य की ऐसी घटनाओं को रोकना होगा।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि धार्मिक आस्था से जुड़े मुद्दों में थोड़ी भी चूक बड़े विवाद को जन्म दे सकती है। कलाकारों को चाहिए कि वे कला की सीमा में रहकर ही रचनात्मकता को प्रस्तुत करें और प्रशासन को चाहिए कि वह समय रहते सतर्कता बरते। इसी समन्वय से ही सामाजिक संतुलन बना रह सकता है और ऐसे विवाद टाले जा सकते हैं।




