इंदौर के रेडीमेड कपड़ा व्यापारी राजू नानकानी की आत्महत्या की घटना ने शहर में सनसनी फैला दी है। फैक्ट्री में फांसी लगाकर जान देने वाले इस कारोबारी के पीछे की वजह कर्ज और मानसिक तनाव बताई जा रही है।

पूरी घटना कैसे हुई
65 वर्षीय राजू नानकानी इंदौर के निपानिया क्षेत्र के क्लिफ्टन प्राइड में रहते थे और रेडीमेड गारमेंट्स का खुद का कारोबार वर्षों से चला रहे थे। मंगलवार की रात वे फैक्ट्री में रुकने की बात कहकर नहीं लौटे। जब देर रात तक कोई जवाब नहीं मिला, तो बेटे सागर और चाचा भगवान फैक्ट्री पहुंचे, जहां उन्होंने राजू को फंदे पर लटका पाया।
परिवार की प्रतिक्रिया
राजू के बेटे सागर जो एक IT इंजीनियर हैं, उन्होंने बताया कि पिता लंबे समय से आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे थे। हालांकि उन्होंने कभी यह नहीं बताया कि कर्ज कितना है या किससे लिया गया है। राजू की पत्नी और शादीशुदा बेटी भी इस घटना से सदमे में हैं।
कर्ज के दबाव में थे व्यापारी
पुलिस को फैक्ट्री से मिले दो पन्नों के सुसाइड नोट में राजू ने स्पष्ट तौर पर लिखा है कि वे कर्जदारों से तंग आ चुके थे। लगातार कॉल, धमकियाँ और पैसे लौटाने का दबाव उन्हें मानसिक रूप से तोड़ रहा था। उन्होंने यह भी लिखा कि अब वे यह तनाव और नहीं झेल सकते।
सुसाइड नोट में लिखी बातें
राजू ने अपने सुसाइड नोट में अपने परिवार से माफी मांगी और लिखा कि वे अब इस दुनिया में और नहीं रह सकते। उन्होंने कर्जदाताओं द्वारा किए गए मानसिक उत्पीड़न का जिक्र करते हुए खुद को दोषी नहीं माना।
पुलिस की कार्यवाही और जांच
हीरानगर पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और सुसाइड नोट जब्त कर लिया गया है। पुलिस अब उन सभी व्यक्तियों से पूछताछ करने की तैयारी में है, जिनसे राजू ने उधारी ली थी। पूरे मामले की विस्तृत जांच चल रही है।
व्यवसायिक तनाव और समाज
आज के दौर में छोटे और मध्यम स्तर के व्यापारी सबसे अधिक आर्थिक दबाव का शिकार हो रहे हैं। लॉकडाउन, महंगाई और बाज़ार में प्रतिस्पर्धा जैसे कारणों से व्यापारियों पर घाटे और उधारी का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।
परिवार से संवाद की आवश्यकता
राजू नानकानी के केस में यह स्पष्ट हुआ कि उन्होंने अपनी समस्याओं को परिवार के साथ साझा नहीं किया। यदि समय रहते मन की बात किसी से कह दी जाती, तो शायद यह दुखद अंत टल सकता था।
मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी
भारत में अभी भी मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता की कमी है। लोग डिप्रेशन, एंग्जाइटी जैसी समस्याओं को सामान्य तनाव समझकर टालते हैं, जबकि सही समय पर मदद मिल जाए तो जीवन बचाया जा सकता है।
समाधान के सुझाव
- व्यापारी वर्ग के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता केंद्र बनाए जाएं।
- सरकार द्वारा कर्ज राहत योजनाओं की समीक्षा और मजबूती होनी चाहिए।
- परिवार और समाज को मिलकर ऐसे व्यक्तियों की पहचान और सहयोग करना होगा।
- हर जिले में मनोवैज्ञानिक सहायता सेवाओं की उपलब्धता जरूरी है।
इस दर्दनाक घटना से हमें यह सीख मिलती है कि आर्थिक तनाव के समय परिवार, समाज और सरकार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।




