गोगा नवमी के पावन पर्व पर आलोट नगर में मंगलवार को वाल्मीकि समाज द्वारा भव्य छड़ी यात्रा का आयोजन किया गया। इस धार्मिक आयोजन ने पूरे नगर को भक्तिमय वातावरण में सराबोर कर दिया। ढोल, डीजे और गूंजते हुए जयकारों के साथ समाज के लोग उत्सव में डूबे रहे।

उत्सव की शुरुआत उपाली टोली से
यह विशाल यात्रा उपाली टोली से प्रारंभ हुई, जहां गोगा देव की छड़ी को रंग-बिरंगे कपड़ों, फूलों और रोशनी से सजाया गया था। युवाओं ने छड़ी निशान को कंधों पर उठाया और पूरे जोश के साथ जयकारे लगाते हुए नगर भ्रमण की शुरुआत की।
यात्रा का मार्ग नगर के सभी प्रमुख स्थानों से होकर गुजरा। समाज के सदस्य गोगा देव के भजनों पर झूमते नजर आए। महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग सभी ने इस धार्मिक उत्सव में बढ़-चढ़कर भाग लिया। ढोल की थाप और डीजे की धुन ने यात्रा को और भी आकर्षक बना दिया।
सड़कों पर पुष्पवर्षा और स्वागत
नगरवासियों ने इस धार्मिक यात्रा का हृदय से स्वागत किया। यात्रा के मार्ग में कई स्थानों पर लोगों ने श्रद्धालुजनों पर फूलों की वर्षा की और माला पहनाकर सम्मानित किया। यह आयोजन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता का उदाहरण भी बना।
समापन नगर परिषद चौराहे पर हुआ
रात होते-होते यात्रा नगर परिषद चौराहे पर पहुंची, जहां गोगा देव की विधिवत पूजा-अर्चना की गई। श्रद्धालुओं ने दीप जलाए, मंत्रोच्चार किए और परंपरागत तरीके से छड़ी को अर्पित किया गया। यह समापन समारोह श्रद्धा और उत्साह से भरा रहा।
पूरे नगर में भक्तिमय माहौल बना रहा। गली-मोहल्लों में गूंजते जयकारों ने वातावरण को आध्यात्मिक बना दिया। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर आयु वर्ग के लोगों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली।
भक्ति के साथ भाईचारे का संदेश
गोगा नवमी पर निकली यह यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज में सौहार्द और समरसता का प्रतीक बनी। वाल्मीकि समाज के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने बताया कि इस आयोजन में नगरवासियों का भरपूर सहयोग मिला, जिसके लिए वे सभी के आभारी हैं।
समाज के प्रतिनिधियों ने यह भी कहा कि ऐसे आयोजनों से युवा पीढ़ी में धार्मिक चेतना उत्पन्न होती है और सामाजिक एकजुटता को बल मिलता है। आने वाले वर्षों में इस परंपरा को और अधिक भव्य रूप देने की योजना बनाई जा रही है।
गोगा नवमी पर निकली इस छड़ी यात्रा ने यह साबित कर दिया कि आस्था, भक्ति और एकता जब एक साथ मिलती हैं, तो समाज में सकारात्मकता और समरसता का संदेश स्वतः ही प्रसारित होता है। आलोट की यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, और आज भी उसी ऊर्जा और भावना के साथ निभाई जा रही है।




