खनिज विभाग जमीन घोटाला: नाबालिग के नाम लीज जारी कर हथियाई गई करोड़ों की संपत्ति

इंदौर में खनिज विभाग के अफसरों ने एक नाबालिग को बालिग बताकर बेशकीमती जमीन लीज पर दे दी। मामला 28 साल बाद सामने आया और अब हाईकोर्ट के निर्देश पर केस दर्ज किया गया है।

खनिज विभाग जमीन घोटाला में विभागीय लापरवाही और कागजी खेल से करोड़ों की सरकारी संपत्ति को निजी हाथों में सौंप दिया गया। 1997 में एक बालक को 18 साल का दिखाकर 9 एकड़ जमीन का पट्टा जारी किया गया, जबकि वह महज 7 साल का था।

28 साल पुराना मामला उजागर

मामले की शुरुआत 1997 में हुई थी, जब दीपक वर्मा ने खुद को बालिग बताकर पट्टे के लिए आवेदन किया। असल में उसका जन्म 1990 में हुआ था। इसके बावजूद खनिज विभाग ने कोई सत्यापन नहीं किया और लीज जारी कर दी गई।

झूठी उम्र के दस्तावेजों से मिली लीज

आवेदन और शपथ पत्र में उम्र 18 वर्ष दर्शाई गई थी, जबकि जन्मवर्ष 1990 था। अधिकारियों ने इसकी पुष्टि किए बिना 9 एकड़ की जमीन 10 वर्षों के लिए लीज पर दे दी। यह साफ दर्शाता है कि विभागीय कर्मचारियों की मिलीभगत रही।

लीज रिन्यू में अनियमितताएं

2008 में जब लीज रिन्यू करने की प्रक्रिया शुरू हुई, तो आवेदन में दीपक की उम्र 19 साल दर्ज की गई। यानी 11 साल बाद भी उम्र केवल एक साल बढ़ी। लेकिन अफसरों ने फिर भी लीज बढ़ा दी, जो दर्शाता है कि अनियमितताएं जारी रहीं।

मालिकाना हक का अवैध हस्तांतरण

18 फरवरी 2017 को दीपक वर्मा ने लीज अधिकारों समेत पूरा प्लांट शमा खान को बेच दिया। इसके लिए विभाग की अनुमति नहीं ली गई। फिर भी 2018 में लीज शमा खान के नाम रिन्यू कर दी गई। यह पूर्णतः नियमों का उल्लंघन था।

कोर्ट की दखल और केस

बद्रीलाल नामक व्यक्ति को पास की जमीन पर पट्टा मिला था, जो दीपक वर्मा की लीज सीमा से टकरा रही थी। बद्रीलाल ने कोर्ट में याचिका दायर की। जांच के बाद हाईकोर्ट ने 5 अप्रैल 2024 को आदेश दिया कि दीपक व शमा के साथ-साथ जिम्मेदार अफसरों पर केस दर्ज किया जाए।

घटनाक्रम की समयरेखा

  • 27 अगस्त 1997: दीपक वर्मा ने खुद को 18 साल का बताकर 9 एकड़ जमीन का पट्टा मांगा।
  • 28 अप्रैल 2008: 10 साल बाद लीज रिन्यू करने का आवेदन किया, उम्र 19 साल बताई।
  • 18 फरवरी 2017: दीपक वर्मा ने शमा खान को लीज और प्लांट बेचा।
  • 6 अप्रैल 2018: शमा खान ने रिन्यूअल का आवेदन किया।
  • 19 जुलाई 2018: बिना अनुमति के लीज शमा खान के नाम रिन्यू हो गई।

लोकायुक्त की कार्रवाई और जांच

लोकायुक्त एसपी डॉ. राजेश सहाय के अनुसार, हाई कोर्ट के आदेश के तहत केस दर्ज किया जा चुका है। अब उन अधिकारियों और कर्मचारियों की पहचान की जा रही है जो 1997 से 2018 तक इस मामले में पदस्थ रहे और इसमें शामिल रहे। जांच के बाद नामजद कार्रवाई की जाएगी।

प्रशासन की साख पर सवाल

यह मामला दर्शाता है कि कैसे विभागीय लापरवाही से सरकारी संपत्ति का दुरुपयोग किया गया। इस तरह के प्रकरण प्रशासनिक पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं और इनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।

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