
रामजी कलसांगरा का नाम देश के सबसे चर्चित ब्लास्ट केस में सामने आया था, लेकिन वह 2008 से ही गायब हैं। उनके बेटे देवव्रत और पत्नी लक्ष्मी आज भी इस सवाल के जवाब की तलाश में हैं कि रामजी जिंदा हैं या नहीं।
- रामजी कलसांगरा और मालेगांव केस
- परिवार की मानसिक और सामाजिक पीड़ा
- NIA और ATS की अलग-अलग थ्योरी
- जांच में लापरवाही या कुछ छिपा?
- लक्ष्मी कलसांगरा का दर्द
- संपत्ति जब्ती और दस्तावेज गायब
- कानूनी स्थिति पर विशेषज्ञों की राय
रामजी कलसांगरा और मालेगांव केस
29 सितंबर 2008 को मालेगांव में हुए बम धमाके में 6 लोगों की मौत हुई थी। इसके पीछे आरोप रामजी और संदीप डांगे पर लगाए गए, लेकिन दोनों तब से ही फरार हैं।
परिवार की मानसिक और सामाजिक पीड़ा
रामजी के बेटे बताते हैं कि कैसे पूरे परिवार को समाज में हीनता से देखा गया। मां लक्ष्मी ने अकेले मेहनत कर बेटों को पढ़ाया और खड़ा किया।
NIA और ATS की अलग-अलग थ्योरी
ATS की चार्जशीट में रामजी को बम प्लानिंग का मास्टरमाइंड बताया गया, वहीं NIA की रिपोर्ट इस पर कमजोर रही। कोर्ट में कोई पुख्ता सबूत पेश नहीं हो सके।
जांच में लापरवाही या कुछ छिपा?
रिटायर्ड ATS अधिकारी ने कोर्ट में हलफनामा दिया था कि रामजी और संदीप की कस्टडी में मौत हुई थी। फिर क्यों NIA ने इस पर कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया?
लक्ष्मी कलसांगरा का दर्द
लक्ष्मी कहती हैं, “मैं आज भी उन्हें जीवित मानती हूं, क्योंकि सरकार या एजेंसियों ने हमें अब तक कुछ भी नहीं बताया।”
संपत्ति जब्ती और दस्तावेज गायब
NIA ने परिवार का फ्लैट कुर्क कर लिया और सभी फोटो, दस्तावेज साथ ले गई। अब परिवार के पास उनकी एक भी तस्वीर नहीं है।
कानूनी स्थिति पर विशेषज्ञों की राय
वकीलों के मुताबिक आपराधिक मामलों में जब तक आरोपी जीवित माना जाता है, मुकदमा जारी रहता है। सिविल केसों में 7 साल बाद मृत मानने की अनुमति होती है, लेकिन यह केस आपराधिक है।
रामजी कलसांगरा का गायब रहना सिर्फ एक व्यक्ति की बात नहीं, बल्कि पूरी प्रणाली की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है। क्या कभी सच्चाई सामने आएगी?




