भोपाल। मध्यप्रदेश में राजस्व विभाग के तहसीलदारों और नायब तहसीलदारों ने प्रशासनिक फैसलों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। बुधवार, 6 अगस्त से प्रदेशभर के जिला मुख्यालयों पर अधिकारियों ने विरोध स्वरूप गैर-आपदा प्रबंधन संबंधी सभी कार्यों से विराम लेने का एलान किया है। यह प्रदर्शन फिलहाल सामूहिक हड़ताल के स्वरूप में नहीं है, लेकिन इसका असर नागरिकों के रोजमर्रा के कामकाज पर निश्चित तौर पर पड़ेगा।

क्यों भड़के हैं राजस्व अधिकारी?
दरअसल, हाल ही में सरकार द्वारा राजस्व अधिकारियों को न्यायिक और गैर न्यायिक कार्यों में विभाजित कर दिया गया। इस फैसले के चलते फील्ड में तैनात अधिकारी अब राजस्व मामलों की सुनवाई नहीं कर रहे और जो न्यायिक कार्यों से जुड़े हैं, वे फील्ड निरीक्षण व अन्य कार्यों से वंचित हैं। इस असंगत व्यवस्था के खिलाफ अधिकारी लंबे समय से असंतोष प्रकट कर रहे थे, जो अब विरोध की शक्ल में सामने आ रहा है।
प्रदेश के 21 जिलों में लागू की गई योजना
शुरुआत में यह प्रायोगिक योजना केवल 12 जिलों में लागू की गई थी, लेकिन बाद में बिना पूर्व परामर्श के इसे 9 और जिलों तक विस्तार दे दिया गया। अधिकारियों का कहना है कि उन्हें न योजना के क्रियान्वयन की तैयारी का मौका दिया गया और न ही आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की गई।
राजस्व अधिकारियों के संगठन ने इस संदर्भ में राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों से भी चर्चा की थी, लेकिन जब समाधान नहीं निकला, तो विरोध का रास्ता अपनाया गया।
विरोध की रणनीति: डोंगल सील, वाहन जमा और वॉट्सऐप ग्रुप से बाहर
राजस्व अधिकारी संगठन द्वारा जारी दिशानिर्देशों के अनुसार, सभी अधिकारी अपने डिजिटल सिग्नेचर डोंगल सीलबंद कर जिला अध्यक्ष को सौंपेंगे। साथ ही वे अपने सरकारी वाहन विभाग में जमा करा देंगे। इतना ही नहीं, जिलों के अधिकृत वॉट्सऐप ग्रुप से भी वे बाहर निकलने का एलान कर चुके हैं।
सिर्फ आपदा प्रबंधन से नहीं हटेंगे
अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि वे आपदा प्रबंधन जैसे आपातकालीन कार्यों में सहभागी बने रहेंगे, ताकि जनहित प्रभावित न हो। लेकिन जमीन संबंधी कार्य, दाखिल-खारिज, नामांतरण जैसे प्रशासनिक कार्यों को वे स्थगित रखेंगे। इससे आम जनता को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
अधिकारियों की नाराजगी का आधार क्या है?
तहसीलदारों का तर्क है कि उन्हें कार्यपालिक दंडाधिकारी के दायित्व से जोड़ा गया है, लेकिन यह जिम्मेदारी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं की गई है। लगभग 45% अधिकारियों को उनके पारंपरिक राजस्व कार्यों से अलग कर दिया गया है, जिससे प्रशासनिक कार्यक्षमता प्रभावित हो रही है। इस असमंजस की स्थिति में अधिकारियों की जवाबदेही भी अस्पष्ट हो गई है।
उन्होंने सरकार से स्पष्ट मांग की है कि यदि कार्यपालिक दंडाधिकारी के कार्यों को संभालने के लिए नई व्यवस्था बनाई जा रही है, तो बेहतर होगा कि यह जिम्मेदारी पुलिस विभाग या सामान्य प्रशासन को दे दी जाए।
आमजन होंगे सबसे ज्यादा प्रभावित
इस प्रशासनिक टकराव का सीधा असर जनता पर पड़ेगा। जमीन संबंधी मामलों की सुनवाई रुकेगी, पटवारी रिपोर्ट लंबित हो सकती है, और न्यायालयीन प्रक्रियाएं धीमी पड़ जाएंगी। रजिस्ट्री, नक्शा सुधार, सीमांकन जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेजी कार्यों पर भी विराम लग सकता है।
वहीं दूसरी ओर, आपदा प्रबंधन से जुड़े कार्य जैसे बाढ़, आगजनी या अन्य प्राकृतिक आपदाओं की स्थितियों में अधिकारी पूरी तरह से सहयोग करेंगे।
सरकार की चुप्पी बनी चिंता का कारण
अब तक सरकार की ओर से इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। अधिकारियों को उम्मीद थी कि उनकी मांगों पर विचार करते हुए कोई सुलह समाधान प्रस्तुत किया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इससे संगठन की नाराजगी और बढ़ गई है।
संघ की आंतरिक बैठकें अब लगातार चल रही हैं और भविष्य की रणनीतियों पर विचार किया जा रहा है। अगर सरकार ने जल्द समाधान नहीं दिया, तो यह आंदोलन राज्यव्यापी स्तर पर बड़े स्वरूप में बदल सकता है।
आगे की राह क्या होगी?
राजस्व विभाग का यह आंदोलन फिलहाल केवल विरोध प्रदर्शन के तौर पर चल रहा है। लेकिन यदि राज्य सरकार द्वारा जल्द सुनवाई नहीं की गई, तो यह आगामी दिनों में चरणबद्ध हड़ताल, ज्ञापन, प्रेस वार्ता जैसे रूपों में बदल सकता है। अधिकारियों ने संकेत दिया है कि वे अपने संवैधानिक दायित्वों से पीछे नहीं हटेंगे लेकिन कार्य विभाजन को लेकर सरकार को पुनर्विचार करना ही होगा।
मध्यप्रदेश के राजस्व विभाग में न्यायिक और प्रशासनिक कार्यों के बीच खिंची यह रेखा केवल अधिकारियों की नहीं, बल्कि आम जनता की भी समस्या बन चुकी है। अगर इस असंतुलन को जल्द सुधारा नहीं गया, तो प्रशासनिक तंत्र की जड़ें प्रभावित हो सकती हैं। ऐसे में जरूरी है कि शासन संवाद कायम करे और ऐसी नीति लाए जो अधिकारियों की कार्यक्षमता को भी बनाए रखे और जनता की सेवा में भी बाधा न आए।




